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चाइनीज का विरोध भी नहीं बढ़ा पा रहा कुम्हार के चाक की रफ्तार

अंजनी राय.

बैरिया (बलिया) दीपावली के त्यौहार को लेकर हर तरफ उत्साह और खुशहाली का माहौल है लेकिन वर्षों से जिसके दिए आपकी दीपावली को रोशन करते हैं उसके घर में उदासी है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने  दीपावली के त्योहार पर देशवासियो से अपील किये की दिपावली के दिन अपने घरों को मिट्टी के दिए से सजाये लेकिन इसका असर देखने को नहीं मिला रहा है। दिपावली के त्यौहार आने के बाद भी कुम्हारों के चेहरे पर मुस्कान नहीं मिल पा रहा है। इसका कारण यही है की कुम्हारों का धंधा मंदा है। कुम्हार इसके पीछे मोमबत्ती,चाईनीज लाइट व प्लास्टिक के अधिक उत्पादों का चलन और सरकार की बेरुखी बताते हैं। वही मिट्टी ने भी कुम्हार के चाक को धीमा करने का काम किया है। बर्तन बनाने वाले कारीगर मधुबनी निवासी रमेश्वर प्रजापती कहते हैं कि आज महंगाई की मार और सरकार की बेरुखी के कारण कुम्हार का चाक चौपट होने के कगार पर है। कारण ये है कि प्लास्टिक के उत्पादों ने इस रोजगार को बर्बाद कर दिया है। दूसरा कारण है मिट्टी माफिया। कुम्हार को मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मौटी रकम अदा करनी पड़ रही है। कुम्हार के खर्चे बढ़े हैं लेकिन खिलोनों या मिट्टी के अन्य सामन के दाम वही हैं। मौजूदा दौर में मेले भी लगना कम हो गए हैं इसलिए खिलोनों के खरीददार अब कम रह गए हैं। बच्चों के खिलोने भी प्लास्टिक के मिलने लगें हैं। गांव के महिलाओं का कहना है की पिछले कुछ बरसों से जो लोग मिट्टी खिलौने वाले जो गांवो में घुम घुम मिट्टी के खिलौने बेचा करते थे वो लोग भी अब दिखाई नहीं देते। वहीं तालिबपुर के ब्रजेश सिंह ने बताया कि कुम्हार दिन रात मेहनत करके पहले तो मिट्टी इकट्ठा करता है, फिर इसमें से ईंट-कंकरीट के टुकड़ों को अलग करके इसे चिकना बनाता है। तब इस मिट्टी से तरह-तरह के खिलौने बनाता है। आग में पकाता है और बेचता है। इस काम में कुम्हार के परिवार का हर सदस्य चाहे वो बच्चा हो, जवान हो या बूढ़ा, महिला हो या पुरूष सभी एक मजदूर की हैसियत से काम करते हैं। लेकिन काफी परिश्रम के बाद भी इनके चाक की गति धीमी पड़ती जा रही है। पं राजनारायण तिवारी बताते हैं की मिट्टी से बना कलश, दिया,ढकनी आदि कई मिट्टी के पात्र पुजा आदि अनुष्ठानों में मिट्टी के पात्र का ही प्रयोग होता है। जबसे आर्थिक सुधार शुरू हुए हैं तब से इनकी बदहाली और बढ़ी है। मुक्त बाज़ार व्यवस्था ने कुम्हारों के परम्परागत पेशे पर पानी फेरने का काम किया है।कुम्हारों का कहना है कि हर वस्तु का मूल्य बढ़ चुका है लेकिन उनके द्वारा बनाए गये चुक्के, दीपों, सुराहियों और अन्य वस्तुओं का मूल्य लगभग पहले जितना ही है। जब मूल्य बढ़ाते हैं तो इन वस्तुओं के खरीदार और भी कम हो जाते हैं। इसी कारण सिर्फ कुम्हार का चाक ही नहीं डगमगा रहा है बल्कि इस पेशे से जुड़े लोग आज बेबस हैं यही कारण है कि आर्थिक सुधारों की बयार में कुम्हार का चाक गतिहीन होता जा रहा है। पहले हमारी किताबों में कुम्हार का चाक नाम से एक अध्याय ही हुआ करता था, अब वो अध्याय भी पढ़ने को नहीं मिलता। फिर भी हमें याद रखना चाहिए कि चाक के अविष्कार ने ही दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाया। यदि चाक का अविष्कार नहीं हुआ होता तो आज हमारे पास न तो इतना समृद्ध भौतिक विज्ञान होता और न ही गणित और ज्यामिती। अगर सरकार अपनी नींद से नहीं जागी तो वो दिन दुर नहीं जब ये प्राचीन काल से चला आ रहा मिट्टी के बर्तनों का काम अपना दम तोड़ देगा ।

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